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रुकुना रथ यात्रा 2026: आज भुवनेश्वर में निकलेगा लिंगराज का भव्य रथ

रुकुना रथ यात्रा 2026 आज भुवनेश्वर में. समय, महत्व और पूरी जानकारी जानें. अभी पढ़ें और अपडेट रहें.Alt Text for Image: भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का ...
भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का भव्य रुकुना रथ और श्रद्धालुओं की भीड़
भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का भव्य रुकुना रथ और श्रद्धालुओं की भीड़
मुख्य निष्कर्ष:
  • आज अशोकाष्टमी पर लिंगराज का रुकुना रथ निकलेगा
  • पहंडी 10:45 बजे, रथ खींचना 2:30 बजे से शुरू
  • लाखों श्रद्धालु जुटेंगे, इसे पाप विनाशक यात्रा माना जाता है

भुवनेश्वर : भुवनेश्वर में आज रुकुना रथ यात्रा 2026 का आयोजन हो रहा है, जो ओडिशा के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है. अशोकाष्टमी के इस खास दिन भगवान लिंगराज मंदिर से निकलकर रथ पर सवार होंगे और रameshwar मंदिर तक यात्रा करेंगे. इस आयोजन का धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव इतना बड़ा है कि लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने पहुंचते हैं.

सुबह से ही मंदिर परिसर और सड़कों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है. हर कोई उस क्षण का इंतजार कर रहा है जब महाप्रभु लिंगराज रथ पर विराजमान होंगे.

रुकुना रथ यात्रा 2026: समय और प्रमुख आयोजन

इस वर्ष पहंडी यानी भगवान को मंदिर से बाहर लाने की प्रक्रिया सुबह 10:45 बजे शुरू होगी. इसके बाद भगवान लिंगराज रथ पर विराजमान होंगे.

रथ खींचने की शुरुआत दोपहर 2:30 बजे होगी, जो ‘आज्ञामाला’ मिलने के बाद ही संभव होती है. परंपरा के अनुसार, भगवान लिंगराज पहले मूंग दाल और अन्न का भोग ग्रहण करते हैं, फिर रथ पर चढ़ते हैं.

इस यात्रा में देवी रुक्मिणी और भगवान वासुदेव भी रथ पर साथ रहते हैं, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है.

क्यों खास है रुकुना रथ यात्रा

रुकुना रथ यात्रा को “पाप विनाशी यात्रा” भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दौरान भगवान के दर्शन करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं.

जैसे ही रथ मंदिर से निकलता है, पूरे क्षेत्र में ढोल-नगाड़ों की गूंज, लोक संगीत और “हरि बोल” के जयकारे माहौल को भक्तिमय बना देते हैं.

यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है.

रुकुना रथ यात्रा 2026 की पौराणिक कहानी: राम और शिव से जुड़ी है परंपरा

एक मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने रावण वध के बाद पाप मुक्ति के लिए एकाम्र क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा की थी. उसी से इस यात्रा की शुरुआत मानी जाती है.

दूसरी कथा में बताया गया है कि भगवान शिव ने रुकुना नाम के रथ पर सवार होकर त्रिपुरासुर का वध किया था. उसी विजय की याद में यह रथ यात्रा हर साल निकाली जाती है.

रथ यात्रा की परंपराएं और व्यवस्थाएं

इस यात्रा में ब्रह्मा को रथ का सारथी माना जाता है और हजारों श्रद्धालु मिलकर रथ खींचते हैं. रथ रameshwar मंदिर के पास रुकता है, जहां चार दिन तक पूजा होती है.

इसके बाद 30 मार्च को बहुड़ा यानी वापसी यात्रा होगी. प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए हैं ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से दर्शन कर सकें.

इस साल भी उम्मीद है कि लाखों लोग इस भव्य आयोजन में शामिल होकर अपनी आस्था प्रकट करेंगे.

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